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भारतीय छात्रों का 'अमेरिकी सपने' से मोहभंग, यूरोप बन रहा शिक्षा का नया केंद्र

Summary
अमेरिका में सख्त वीजा नियम और बढ़ती लागत के बीच, भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से उत्साहित भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए तेजी से यूरोप का रुख कर रहे हैं।
भारतीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा की पारंपरिक पसंद रहे अमेरिका का आकर्षण अब फीका पड़ रहा है, और इसकी जगह यूरोपीय देश ले रहे हैं। अमेरिका में सख्त होती आव्रजन नीतियां, पढ़ाई का भारी खर्च और इसके विपरीत भारत-यूरोपीय संघ (EU) के नए व्यापार समझौते के तहत मिल रही सहूलियतें इस बदलाव की मुख्य वजह हैं।
रुझान में बदलाव के कारण
इस बदलाव के पीछे कई बड़े कारण हैं। एक तरफ, अमेरिका ने विदेशी छात्रों के लिए वीजा की अवधि को और सख्त कर दिया है, जिससे वहां पढ़ाई और उसके बाद काम करने को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। शिक्षा सलाहकार केसी ओवरसीज के अनुसार, यूरोप में ट्यूशन फीस आमतौर पर अमेरिका की तुलना में 50% से 80% तक कम है, और रहने का खर्च भी कम होता है।
वहीं दूसरी ओर, जनवरी में हुए भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते ने भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए नए दरवाजे खोले हैं। इस समझौते का उद्देश्य आसान वीजा प्रक्रिया, पढ़ाई के बाद काम करने के स्पष्ट रास्ते और भारतीय योग्यताओं को बेहतर मान्यता देकर आवाजाही को सुगम बनाना है। एक यूरोपीय संघ के अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया, "यूरोपीय संघ भारतीय छात्रों के लिए एक प्रमुख गंतव्य बन गया है... यह प्रवृत्ति बढ़ती रहेगी, जिससे यूरोप के टैलेंट पूल और भारत के वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कार्यबल दोनों को लाभ होगा।"
आंकड़ों में यूरोप की बढ़ती लोकप्रियता
आंकड़े भी इस बदलते रुझान की पुष्टि करते हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों की कुल संख्या 2023 के 9,08,000 से घटकर 2025 में लगभग 6,26,000 रह गई। स्टडी-अब्रॉड प्लेटफॉर्म लीप के सह-संस्थापक अर्नव कुमार ने अगले तीन से पांच वर्षों में यूरोप जाने वाले छात्रों और श्रमिकों की संख्या में 60% से 70% की वृद्धि का अनुमान लगाया है।
कई यूरोपीय देशों में भारतीय छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई हैः
Ad- नीदरलैंड्स: स्टैटिस्टिक्स नीदरलैंड्स के अनुसार, 2025/26 में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़कर लगभग 3,700 हो गई, जो 2018/19 में 2,630 थी।
- आइंडहोवन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी: यहां भारतीय छात्रों के प्री-एनरोलमेंट की संख्या एक साल पहले के 1,390 से बढ़कर लगभग 2,140 हो गई।
- लीडेन यूनिवर्सिटी: यहां मास्टर प्रोग्राम में भारतीय छात्रों का प्रवेश 2021 के 70 से बढ़कर इस साल 120 हो गया।
शिक्षा सलाहकार संस्था 'यूरोप स्टडी सेंटर' ने भी व्यापार समझौते के बाद पूछताछ में 25% से 30% की वृद्धि दर्ज की है।
चुनौतियां और भविष्य का रास्ता
हालांकि, यूरोप की राह पूरी तरह आसान नहीं है। छात्रों को भाषा की बाधा, एम्स्टर्डम जैसे प्रमुख शहरों में आवास की कमी और नौकरियों के लिए कड़े मुकाबले जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सलाहकारों का यह भी कहना है कि किसी देश में सिर्फ पढ़ाई कर लेने से नौकरी की गारंटी नहीं मिलती; इसके लिए विशेष कौशल विकसित करना आवश्यक है।
इन चुनौतियों के बावजूद, धारणा बदल रही है। कई छात्र अब अपने करियर के लक्ष्यों के अनुसार देश चुन रहे हैं, जैसे इंजीनियरिंग के लिए जर्मनी और प्रबंधन के लिए फ्रांस। भारत-यूरोपीय संघ समझौते के सफलतापूर्वक लागू होने पर यह रुझान और मजबूत हो सकता है, जिससे वैश्विक छात्र प्रवाह की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव आएगा।