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वैश्विक निवेश में चीनी ऑटो कंपनियों ने अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ा: रिपोर्ट

क्लीन टेक निवेश पर नज़र रखने वाले एक थिंक टैंक, एटलस पब्लिक पॉलिसी के अनुसार, चीनी वाहन निर्माता वैश्विक इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) और बैटरी परियोजनाओं में अपने अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे निकल गए हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि 2019 से 2025 की अवधि में चीनी कंपनियों ने विदेशों में लगभग $101 बिलियन का निवेश किया, जबकि इसी अवधि में अमेरिकी कंपनियों का निवेश $38 बिलियन से कुछ ही अधिक रहा।
निवेश के आंकड़ों में भारी अंतर
रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के मामले में अमेरिकी कंपनियां चीनी फर्मों से आगे थीं, लेकिन उस साल के बाद यह पैटर्न पूरी तरह से पलट गया। चीन के इस आक्रामक निवेश ने उसे वैश्विक ईवी बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया है।
ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के एक फेलो काइल चान ने कहा, "हम एक ऐसी स्थिति का सामना कर रहे हैं, जहां चीन की बीवाईडी (BYD) जैसी कंपनियां अनिवार्य रूप से ईवी युग की नई जीएम और फोर्ड बन रही हैं।" उन्होंने बताया कि ये कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और दुनिया भर में दीर्घकालिक निवेश से लाभ उठा रही हैं।
चीन की वैश्विक विस्तार रणनीति
चीनी वाहन निर्माताओं के विदेश में विस्तार के पीछे तीन मुख्य कारक हैं:
Ad- संतृप्त घरेलू बाजार: चीन का घरेलू कार बाजार संतृप्त हो गया है, जहां कीमतों की जंग और अत्यधिक कारखाना क्षमता के कारण मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया है।
- व्यापार बाधाएं: कई देशों ने चीनी ईवी निर्यात के जवाब में व्यापार बाधाएं खड़ी कर दी हैं। इसके जवाब में, चीनी कंपनियों ने उन देशों में ही विनिर्माण संयंत्र स्थापित करना शुरू कर दिया है ताकि टैरिफ से बच सकें। उदाहरण के लिए, हंगरी में एक चीनी कारखाना यूरोपीय संघ के बाजार तक टैरिफ-मुक्त पहुंच प्रदान करता है।
- वैश्विक उपस्थिति: विदेशों में कारखाने बनाने से चीनी कंपनियों को बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने, संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला और वितरण नेटवर्क स्थापित करने में मदद मिलती है।
बाजार और भविष्य पर प्रभाव
यह विस्तार केवल इलेक्ट्रिक वाहनों तक ही सीमित नहीं है। काइल चान के अनुसार, यह सॉफ्टवेयर, सेंसर, पावरट्रेन और यहां तक कि रोबोटिक्स जैसे संबंधित उद्योगों में भी चीन की तकनीकी क्षमताओं को बढ़ा रहा है। उन्होंने इस प्रक्रिया को "औद्योगिक कूटनीति" (industrial diplomacy) का नाम दिया है, जहां चीन उन देशों में निवेश कर रहा है जिनके साथ वह अपने संबंधों को बेहतर बनाना चाहता है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रवृत्ति से वैश्विक ऑटोमोटिव परिदृश्य में शक्ति का संतुलन बदल सकता है। चीनी कंपनियों की बढ़ती पैठ स्थापित अमेरिकी और यूरोपीय ब्रांडों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती पेश करेगी, जिससे आने वाले वर्षों में प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है।