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अमेरिका-सऊदी अरब परमाणु समझौता: यूरेनियम संवर्धन की अनुमति से चिंताएं बढ़ीं

Summary
संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब एक ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौते पर पहुँचे हैं, जो रियाद को अमेरिकी तकनीक का उपयोग करके यूरेनियम को संवर्धित करने की अनुमति देगा, जिससे मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ की चिंताएँ बढ़ गई हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब ने एक नागरिक परमाणु ऊर्जा समझौते को अंतिम रूप दे दिया है, जो सऊदी अरब को अमेरिकी तकनीक का उपयोग करके परमाणु रिएक्टर बनाने और यूरेनियम संवर्धन करने की अनुमति देगा। अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने बुधवार को इस समझौते की पुष्टि की, जो वर्षों की बातचीत का परिणाम है।
समझौते के प्रमुख प्रावधान
यह समझौता, जिसे आधिकारिक तौर पर 123 समझौता कहा जाता है, अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और उनके सऊदी समकक्ष प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था। इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद शर्तें हैं:
- सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन और परमाणु कचरे के पुनर्प्रसंस्करण का अधिकार मिलेगा। ये दोनों प्रक्रियाएं परमाणु हथियार बनाने के संभावित रास्ते हो सकते हैं।
- यह 2009 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ हुए अमेरिकी समझौते से अलग है, जिसमें UAE ने इन दोनों अधिकारों को छोड़ने पर सहमति व्यक्त की थी।
- इस सौदे में संयुक्त राष्ट्र की अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) द्वारा औचक निरीक्षण की अनुमति देने वाला 'अतिरिक्त प्रोटोकॉल' (Additional Protocol) शामिल नहीं है।
भू-राजनीतिक चिंताएं और अप्रसार के मुद्दे
इस समझौते ने अमेरिकी सांसदों के बीच चिंता पैदा कर दी है, जिन्हें डर है कि इससे मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है तो उनका देश भी ऐसा करेगा।
Adडेमोक्रेटिक सीनेटर एडवर्ड मार्के ने इस सौदे की आलोचना करते हुए कहा, "वे सऊदी अरब, एक लड़ाकू और सत्तावादी राष्ट्र, को परमाणु हथियार प्रौद्योगिकियों को विकसित करने की अनुमति दे रहे हैं, जबकि ईरानी परमाणु बम को रोकने की आड़ में ईरान के साथ युद्ध शुरू कर रहे हैं।" उन्होंने कहा, "यह सौदा हम सभी को कम सुरक्षित बना देगा।" प्रशासन का तर्क है कि यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम के कड़े अप्रसार मानकों का पालन करता है और अगर अमेरिका यह सौदा नहीं करता, तो सऊदी अरब चीन या रूस के साथ साझेदारी कर सकता था, जिनके मानक अलग हैं।
आगे की राह और बाजार पर असर
अब इस समझौते को अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष समीक्षा के लिए रखा जाएगा। कांग्रेस के पास इस पर आपत्ति जताने के लिए 90 सत्र दिवस होंगे। हालांकि, किसी भी राष्ट्रपति के वीटो को ओवरराइड करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जिससे इसे रोकना मुश्किल हो जाता है।
निवेशकों और बाजारों के लिए, यह सौदा अमेरिकी परमाणु प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए नए अवसर खोल सकता है। हालांकि, यह मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव को भी बढ़ाता है, जिसका असर ऊर्जा बाजारों और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है। यह एक दीर्घकालिक विकास है जो अमेरिका-सऊदी संबंधों और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है।