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फेड मिनट्स में आक्रामक रुख की आशंका से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़त

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Jul 12, 20262 min read
फेड मिनट्स में आक्रामक रुख की आशंका से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़त
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अमेरिकी ट्रेजरी और यूरोजोन के सरकारी बॉन्ड यील्ड में मंगलवार को बढ़ोतरी दर्ज की गई, क्योंकि निवेशक फेडरल रिजर्व की जून बैठक के मिनट्स (कार्यवृत्त) जारी होने का इंतजार कर रहे हैं। बाजार को आशंका है कि मिनट्स में भविष्य की मौद्रिक नीति को लेकर आक्रामक या "हॉकिश" (hawkish) रुख देखने को मिल सकता है।

अमेरिकी बॉन्ड बाजार का हाल

बिकवाली के दबाव के कारण बॉन्ड की कीमतें गिरीं और यील्ड (जो कीमतों के विपरीत चलती है) में इजाफा हुआ। बेंचमार्क 10-वर्षीय ट्रेजरी नोट पर यील्ड बढ़कर 4.49% हो गई। इसी तरह, फेड की नीति के प्रति संवेदनशील माने जाने वाले दो-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड भी चढ़कर 4.13% पर पहुंच गया।

हालांकि, सप्ताह की शुरुआत में यील्ड पर कुछ समय के लिए दबाव देखा गया था। यह दबाव जून के नॉन-फार्म पेरोल डेटा के बाद आया था, जिसमें अमेरिकी अर्थव्यवस्था में केवल 57,000 नई नौकरियां जुड़ने की बात सामने आई थी, जो 115,000 के अनुमान से काफी कम थी।

फेड मिनट्स पर टिकी नजरें

बाजार की इस सतर्कता के पीछे मुख्य कारण बुधवार को जारी होने वाले फेडरल रिजर्व की 16-17 जून की बैठक के मिनट्स हैं। यह दस्तावेज फेड के नए चेयरमैन केविन वार्श के नेतृत्व में फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) की आंतरिक कार्यप्रणाली की पहली विस्तृत जानकारी देगा।

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हालांकि केंद्रीय बैंक ने पिछली बैठक में फेडरल फंड्स रेट को 3.50%–3.75% पर स्थिर रखा था, लेकिन साथ में जारी आर्थिक अनुमानों (Summary of Economic Projections) ने अपने आक्रामक रुख से बाजारों को चौंका दिया था। अब निवेशक मिनट्स में इस रुख के बारे में और अधिक स्पष्टता की उम्मीद कर रहे हैं।

यूरोजोन में भी समान रुझान

यूरोप में भी बॉन्ड बाजार में बिकवाली का दबाव देखा गया। जर्मनी के बेंचमार्क 10-वर्षीय बंड पर यील्ड बढ़कर 2.948% हो गया। वहीं, यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) की दरों से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाला दो-वर्षीय यील्ड भी बढ़कर 2.54% पर पहुंच गया।

यूरोजोन में यील्ड बढ़ने का मुख्य कारण सेंटिक्स इंडेक्स (Sentix index) के ताजा आंकड़े हैं, जिनसे जुलाई के लिए निवेशक विश्वास में उम्मीद से कहीं ज्यादा उछाल का पता चला है। बेहतर आर्थिक दृष्टिकोण के कारण निवेशकों ने सुरक्षित माने जाने वाले सरकारी बॉन्ड से पैसा निकालकर इक्विटी जैसे जोखिम भरे विकल्पों में लगाना शुरू कर दिया है, जिससे बॉन्ड पर दबाव बढ़ा है।

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