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ट्रंप का ईरान के साथ 'दिन भर चली बातचीत' का दावा, तेहरान ने किया खंडन

Summary
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि मंगलवार को ईरान के साथ दिन भर बातचीत हुई, लेकिन तेहरान ने ऐसे किसी भी संवाद से इनकार किया है। इस घटनाक्रम का असर होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को ईरान के साथ "दिन भर चली बातचीत" का दावा किया है, जिसे उन्होंने सकारात्मक बताया। हालाँकि, तेहरान ने बातचीत चलने के ट्रंप के दावे का खंडन किया है, जिससे स्थिति पर अनिश्चितता बनी हुई है।
बातचीत पर परस्पर विरोधी बयान
फॉक्स न्यूज के साथ एक साक्षात्कार में, राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, "उनकी दिन भर बातचीत हुई," और आगे कहा, "हमारी बहुत अच्छी चर्चा हो रही है।" यह बयान कतर के उस कथन के कुछ समय बाद आया है जिसमें कहा गया था कि मध्यस्थ ईरान युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों में प्रगति कर रहे हैं।
इसके विपरीत, रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान ने ट्रंप के इस दावे का खंडन किया है कि कोई बातचीत चल रही है। यह परस्पर विरोधी जानकारी कूटनीतिक मोर्चे पर वास्तविक स्थिति को लेकर भ्रम पैदा करती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और बाजार के लिए निहितार्थ
ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी कि होर्मुज जलडमरूमध्य "बहुत जल्द खुलने जा रहा है," और अगर ऐसा नहीं होता है तो ईरान को "बहुत बुरी तरह से" निशाना बनाया जाएगा। होर्मुज जलडमरूमध्य मध्य पूर्व से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
Adइस जलमार्ग का बंद होना या इसमें किसी भी तरह की रुकावट वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति श्रृंखला को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है, जिससे ऊर्जा की कीमतों में भारी अस्थिरता आ सकती है। निवेशकों और बाजारों की इस क्षेत्र के घटनाक्रम पर करीब से नजर है क्योंकि इसका सीधा असर तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक जोखिम पर पड़ता है।
संघर्ष की पृष्ठभूमि
यह कूटनीतिक तनाव 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध के संदर्भ में है, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया था, जिसके जवाब में तेहरान ने भी जवाबी हमले किए थे। युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दिया था।
इस संघर्ष के कारण हजारों लोगों की मौत हुई है और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। ट्रंप के पिछले बयानों में ईरानी नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की धमकियाँ भी शामिल रही हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने आलोचना की है और इसे 1949 के जिनेवा कन्वेंशन का संभावित उल्लंघन बताया है।