Story
गाजा में युद्ध की मार: मधुमक्खी पालन उद्योग तबाह, उत्पादन 90% तक गिरा

Summary
गाजा में युद्ध ने मधुमक्खी पालन उद्योग को लगभग खत्म कर दिया है, जिससे हजारों छत्ते नष्ट हो गए हैं और शहद का उत्पादन युद्ध-पूर्व स्तरों के केवल 10% पर आ गया है। मधुमक्खी पालक अब खंडहरों के बीच अपने व्यापार को फिर से शुरू करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
गाजा में दो साल से अधिक समय तक चले युद्ध ने क्षेत्र के मधुमक्खी पालन उद्योग को लगभग पूरी तरह से नष्ट कर दिया है, जिससे शहद का उत्पादन अपने पूर्व-युद्ध स्तर के एक छोटे से हिस्से तक गिर गया है। मधुमक्खी पालक अब नष्ट हुए खेतों और दुर्गम कृषि भूमि के बीच अपनी आजीविका को फिर से बनाने के लिए भारी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
उत्पादन में भारी गिरावट
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, कृषि इंजीनियर और मधुमक्खी पालक रातेब सम्मौर के मुताबिक, युद्ध ने इस क्षेत्र के शहद उत्पादन पर विनाशकारी प्रभाव डाला है। उत्पादन अब युद्ध से पहले की तुलना में केवल 10% रह गया है।
- युद्ध से पहले: गाजा में लगभग 30,000 मधुमक्खी के छत्ते थे।
- वर्तमान स्थिति: अब केवल लगभग 700 छत्ते ही बचे हैं।
सम्मौर ने यह भी बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण फूलों के मौसम पर असर पड़ने से युद्ध से पहले ही शहद का उत्पादन लगभग 400 मीट्रिक टन से घटकर आधा हो गया था। हालांकि, संघर्ष ने इस गिरावट को बहुत तेज कर दिया है।
पुनर्निर्माण की कठिन चुनौती
Adयुद्ध के कारण अधिकांश खेत और बाग नष्ट हो गए हैं या इजरायल के साथ सीमा के पास होने के कारण दुर्गम हैं। इसके चलते, मधुमक्खी पालकों को वैकल्पिक तरीकों का सहारा लेना पड़ रहा है, जैसे कि क्षतिग्रस्त इमारतों की छतों पर छत्ते रखना और मधुमक्खियों को खिलाने के लिए चीनी के घोल का उपयोग करना।
मधुमक्खी पालक इब्राहिम अल-डब्बा ने कहा, "मधुमक्खियों को पेड़ों की आवश्यकता होती है, हम मलबे के बीच मधुमक्खियां पाल रहे हैं।" दोबारा शुरुआत करना बेहद महंगा साबित हो रहा है। डब्बा ने बताया कि उन्हें सिर्फ तीन छत्ते खरीदने के लिए 10,000 शेकेल ($3,245) का भुगतान करना पड़ा, जिसमें अन्य उपकरणों की लागत शामिल नहीं है।
आर्थिक और पारिस्थितिक प्रभाव
यह संकट केवल शहद उत्पादन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक पारिस्थितिक प्रभाव भी है। मधुमक्खियां क्षेत्र की कृषि के लिए महत्वपूर्ण परागणकर्ता हैं, और उनकी संख्या में भारी कमी भविष्य में फसलों की पैदावार को और प्रभावित कर सकती है।
नुसीरात शिविर में, मधुमक्खी पालक फहद अल-दहदौह जैसे लोग नष्ट हुए कृषि क्षेत्रों से टूटे हुए छत्तों के बक्सों को इकट्ठा कर उनकी मरम्मत कर रहे हैं। यह इस उद्योग से जुड़े लोगों के सामने मौजूद हताशा और लचीलेपन दोनों को दर्शाता है, जो अपने व्यापार को शून्य से फिर से बनाने की कोशिश कर रहे हैं।