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न्यायाधीशों द्वारा नियुक्त सिएटल के अभियोजक ने बर्खास्तगी के बाद ट्रंप पर मुकदमा किया

Summary
सिएटल के शीर्ष संघीय अभियोजक, जिन्हें न्यायाधीशों ने नियुक्त किया था, ने अपनी बर्खास्तगी के बाद ट्रंप प्रशासन पर मुकदमा दायर किया है, जिससे राष्ट्रपति के अधिकार की कानूनी सीमा को चुनौती दी गई है।
सिएटल के शीर्ष संघीय अभियोजक रोजर रोगॉफ ने पिछले सप्ताह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बर्खास्त किए जाने के बाद मंगलवार को प्रशासन पर मुकदमा दायर कर दिया है। यह मामला न्यायाधीशों द्वारा रिक्तियों को भरने के लिए नियुक्त किए गए अमेरिकी अटॉर्नी को हटाने के राष्ट्रपति के अधिकार का एक महत्वपूर्ण कानूनी परीक्षण है।
क्या है पूरा मामला?
सिएटल की संघीय अदालत में दायर मुकदमे के अनुसार, रोजर रोगॉफ को 15 जुलाई को पश्चिमी वाशिंगटन जिले के लिए अदालत द्वारा नियुक्त अमेरिकी अटॉर्नी के रूप में शपथ लेने के ठीक एक घंटे बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने अवैध रूप से हटा दिया। रोगॉफ, जो एक पूर्व संघीय अभियोजक और राज्य अदालत के न्यायाधीश हैं, को एक खाली पद पर न्यायाधीशों द्वारा नियुक्त किया गया था।
रोगॉफ ने अदालत से उनकी बर्खास्तगी को अमान्य घोषित करने और यह फैसला सुनाने का आग्रह किया है कि वह तब तक जिले के अमेरिकी अटॉर्नी बने रहेंगे जब तक कि सीनेट द्वारा पुष्टि किया गया कोई उत्तराधिकारी पदभार ग्रहण नहीं कर लेता। उनका तर्क है कि संघीय कानून अदालत द्वारा नियुक्त अमेरिकी अटॉर्नी को यह सुरक्षा प्रदान करता है।
दोनों पक्षों के तर्क
Adएक बयान में, रोगॉफ ने कहा, "राष्ट्रपति की कार्रवाइयां कानून का उल्लंघन करती हैं, और वे संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की सुरक्षा को नजरअंदाज करती हैं।" उन्होंने आगे कहा कि उनकी बर्खास्तगी "अवैध है और इसे कायम नहीं रखा जा सकता।"
दूसरी ओर, न्याय विभाग ने एक बयान में कहा कि जिला अदालत ने "इस चयन पर डीओजे के साथ समन्वय नहीं किया था। इस प्रकार की अन्य बर्खास्तगी के अनुरूप, यह पूरी तरह से राष्ट्रपति के अधिकार के भीतर है।" कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने भी पिछले सप्ताह एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि "जिला अदालत के न्यायाधीश एक अस्थायी अमेरिकी अटॉर्नी नियुक्त कर सकते हैं, और राष्ट्रपति उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं।"
इस मुकदमे का महत्व
यह कानूनी चुनौती राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों और न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता के बीच की सीमाओं को लेकर एक व्यापक बहस का हिस्सा है। इस मामले का नतीजा भविष्य में राष्ट्रपति द्वारा अदालत-नियुक्त अधिकारियों को हटाने की क्षमता के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है। हालांकि इस घटना का कोई सीधा बाजार प्रभाव नहीं है, लेकिन कार्यकारी शक्ति से जुड़े इस तरह के उच्च-स्तरीय कानूनी विवाद राजनीतिक और नियामक अनिश्चितता को बढ़ा सकते हैं, जिन पर निवेशक करीब से नजर रखते हैं।