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अमेरिकी CPI आंकड़ों से पहले डॉलर और एशियाई मुद्राएं स्थिर, होर्मुज तनाव से तेल चढ़ा

बुधवार को एशियाई बाजारों में अधिकांश मुद्राएं और अमेरिकी डॉलर एक सीमित दायरे में कारोबार करते दिखे, क्योंकि निवेशक अमेरिकी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं, जिससे फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों की भविष्य की दिशा का संकेत मिलेगा। इसके साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में उछाल आया है।
अमेरिकी मुद्रास्फीति आंकड़ों पर बाजार की नजर
बुधवार को जारी होने वाले अमेरिकी CPI आंकड़ों से पहले निवेशकों ने बड़े सौदे करने से परहेज किया, जिसके चलते बाजार में शांति बनी रही। डॉलर इंडेक्स 99.87 के स्तर पर लगभग सपाट था।
अधिकांश एशियाई मुद्राओं में भी मामूली हलचल देखी गई:
- जापानी येन (USD/JPY) 159.41 पर स्थिर रहा।
- चीनी युआन (USD/CNY) और भारतीय रुपया (USD/INR) भी लगभग अपरिवर्तित रहे।
- दक्षिण कोरियाई वॉन (USD/KRW) में 0.4% की बढ़त देखी गई, जो क्षेत्रीय रुझान के विपरीत थी।
Investing.com के अनुसार, अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि जुलाई में हेडलाइन CPI में मासिक आधार पर 0.1% की वृद्धि होगी, जबकि वार्षिक मुद्रास्फीति 3.5% से घटकर 3.4% रह सकती है।
फेडरल रिजर्व के फैसले पर पड़ेगा असर
Adमुद्रास्फीति के ये आंकड़े फेडरल रिजर्व के अगले कदम पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। MUFG के विश्लेषकों ने एक नोट में कहा, "फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) का ध्यान अब श्रम बाजार से ज्यादा मुद्रास्फीति पर केंद्रित हो गया है, इसलिए आज आने वाले CPI के आंकड़े ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।"
CME ग्रुप के FedWatch टूल के मुताबिक, फेडरल रिजर्व की सितंबर की बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना लगभग आधी-आधी है। आंकड़ों के अनुसार, दरें स्थिर रहने की 52% संभावना है, जबकि एक चौथाई प्रतिशत की बढ़ोतरी की 48% संभावना है। यदि मुद्रास्फीति के आंकड़े उम्मीद से कमजोर आते हैं, तो डॉलर पर दबाव पड़ सकता है, जबकि मजबूत आंकड़े डॉलर को सहारा देंगे और एशियाई मुद्राओं पर दबाव डालेंगे।
होर्मुज तनाव से कच्चे तेल में उछाल
एशियाई बाजारों में चिंता का एक और कारण तेल की बढ़ती कीमतें हैं। अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर संदेह और शिपिंग पर हमलों के कारण आपूर्ति में रुकावट की आशंका से ब्रेंट क्रूड वायदा $90 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। ईरानी अधिकारियों के बयानों से होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ गया है, जो एक प्रमुख तेल पारगमन मार्ग है।
तेल की ऊंची कीमतें भारत जैसी तेल आयातक एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। इससे न केवल आयात बिल बढ़ता है, बल्कि यह मुद्रास्फीति के दबाव को भी बढ़ा सकता है, जिससे स्थानीय मुद्राओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।