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अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच कनाडाई नागरिक पीएम कार्नी के सख्त व्यापारिक रुख का समर्थन कर रहे हैं

एक नए सर्वेक्षण से पता चलता है कि अधिकांश कनाडाई नागरिक संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के कड़े व्यापारिक रुख का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं। यह समर्थन एक लंबी व्यापारिक लड़ाई के कारण परिवारों और व्यवसायों के लिए लागत बढ़ने की बढ़ती चिंता के बावजूद सामने आया है।
सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष
द ग्लोब एंड मेल के लिए नैनोस रिसर्च द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि कनाडाई जनता सरकार की व्यापार नीति के पीछे मजबूती से खड़ी है। सर्वेक्षण में 1,037 उत्तरदाताओं को शामिल किया गया और इसके परिणाम कनाडा की स्थिति की दृढ़ता को दर्शाते हैं।
- 85% उत्तरदाताओं ने अमेरिका के साथ एक प्रस्तावित व्यापार सौदे को अस्वीकार करने के कार्नी के फैसले का समर्थन किया या आंशिक रूप से समर्थन किया।
- 80% ने कई अमेरिकी उत्पादों पर डॉलर-के-बदले-डॉलर का जवाबी टैरिफ लगाने की ओटावा की योजना का समर्थन किया।
- लगभग 10 में से 7 उत्तरदाताओं ने कहा कि वे अमेरिकी टैरिफ के जवाब में रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार हैं।
आर्थिक प्रभाव और चिंताएं
ये परिणाम बताते हैं कि कनाडाई नागरिक वाशिंगटन के साथ ओटावा की बातचीत की स्थिति को मजबूत करने के लिए कुछ आर्थिक कष्ट उठाने को तैयार हैं। हालांकि, इस व्यापार विवाद का असर जनता के आत्मविश्वास पर भी पड़ रहा है।
Adलगभग दो-तिहाई कनाडाई लोगों ने कहा कि वे टैरिफ के खुद पर और अपने परिवारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित या कुछ हद तक चिंतित हैं। इसके बावजूद, 10 में से 6 लोगों ने विश्वास जताया कि कनाडा एक नए समझौते के तहत अपने आर्थिक हितों की रक्षा करने में सक्षम होगा।
बिगड़ते द्विपक्षीय संबंध
व्यापार वार्ता पिछले महीने तब टूट गई जब प्रधानमंत्री कार्नी ने यह कहते हुए कनाडाई अधिकारियों को बातचीत से हटने का आदेश दिया कि अमेरिकी मांगें अनुचित हो गई हैं। विवाद के प्रमुख मुद्दों में फ्रांसीसी भाषा की सुरक्षा से लेकर ट्रकों पर टैरिफ तक शामिल थे।
इस तनाव का असर दोनों देशों के संबंधों पर भी दिख रहा है। सर्वेक्षण में तीन-चौथाई उत्तरदाताओं ने इस विचार से असहमति जताई कि अमेरिका एक भरोसेमंद सहयोगी है। हालांकि, भविष्य को लेकर कुछ आशावाद भी है, क्योंकि पांच में से तीन से अधिक लोगों को उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों में सुधार होगा।