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ईरान-अमेरिका तनाव से कच्चे तेल में उबाल, कीमतें $80 प्रति बैरल के पार

मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है, और यह $80 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। सोमवार को कीमतों में 9% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे वैश्विक बाजारों में महंगाई और ब्याज दरों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
तनाव का कारण और आपूर्ति की चिंताएं
यह उछाल वाशिंगटन और तेहरान के बीच शत्रुता बढ़ने के कारण आया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर फिर से नाकाबंदी कर दी है और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सभी जहाजों पर 20% का शुल्क लगा दिया है।
खाड़ी में जहाजों पर ईरानी मिसाइलों के हमलों और अमेरिकी जवाबी कार्रवाई के बाद, इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर शिपिंग ट्रैफिक दो महीने के निचले स्तर पर आ गया है। यह घटनाक्रम वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान की आशंका को बढ़ाता है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्गों में से एक है।
महंगाई और केंद्रीय बैंकों पर दबाव
कच्चे तेल में यह नई तेजी अमेरिका में जून के महंगाई के आंकड़ों के जारी होने से ठीक पहले आई है। ऊर्जा की कीमतों में हालिया नरमी के कारण मुख्य मुद्रास्फीति (headline inflation) में कमी की उम्मीद थी, लेकिन अब यह उम्मीद धूमिल हो गई है।
Adअब निवेशकों का ध्यान कोर मुद्रास्फीति पर होगा, जो अभी भी 3% के करीब बनी हुई है। फेडरल रिजर्व के गवर्नर क्रिस वॉलर ने सोमवार को कहा कि फेड को महंगाई को लक्ष्य पर लाने के लिए कार्रवाई करनी होगी। बाजार अब इस साल के अंत तक फेड द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं।
शेयर बाजारों और वैश्विक संकेतों पर असर
ऊर्जा की कीमतों और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंकाओं के कारण शेयर बाजारों पर दबाव देखा जा रहा है, खासकर चिप शेयरों में गिरावट आई है। इस सप्ताह अमेरिका में तिमाही नतीजों का सीजन भी शुरू हो रहा है, जिसमें आज जेपी मॉर्गन, बैंक ऑफ अमेरिका और गोल्डमैन सैक्स जैसे बड़े बैंक अपने नतीजे जारी करेंगे।
इन तनावों के बीच, चीन के आर्थिक आंकड़ों ने कुछ राहत दी है। जून में चीन का निर्यात और आयात, दोनों उम्मीद से बेहतर रहे, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मजबूती का संकेत देते हैं। चिप्स और ऑटोमोबाइल निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई, जो दर्शाता है कि इस संकट से पहले वैश्विक मांग मजबूत थी।