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सिटी और ANZ ने मध्य पूर्व में आपूर्ति बाधाओं के कारण ब्रेंट क्रूड का पूर्वानुमान बढ़ाया

Summary
मध्य पूर्व में आपूर्ति संबंधी व्यवधानों के कारण वैश्विक बाजारों पर पड़ रहे असर के बीच, सिटी और ANZ ने ब्रेंट क्रूड तेल के लिए अपने मूल्य पूर्वानुमानों को बढ़ा दिया है।
प्रमुख वित्तीय संस्थानों सिटी (Citi) और एएनजेड (ANZ) ने मध्य पूर्व में जारी आपूर्ति बाधाओं के जवाब में ब्रेंट क्रूड तेल के लिए अपने मूल्य पूर्वानुमानों में वृद्धि की है। यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता और कीमतों पर दबाव को दर्शाता है।
पूर्वानुमानों में बदलाव
दोनों बैंकों ने मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति श्रृंखला पर उनके प्रभाव का हवाला देते हुए अपने अनुमानों को संशोधित किया है। ये नए पूर्वानुमान निकट भविष्य में तेल की कीमतों में मजबूती बने रहने का संकेत देते हैं।
- सिटी (Citi): बैंक ने 2026 की तीसरी तिमाही के लिए अपने ब्रेंट पूर्वानुमान को बढ़ाकर $86 प्रति बैरल कर दिया है।
- एएनजेड (ANZ): ANZ ने अपने अल्पकालिक ब्रेंट क्रूड पूर्वानुमान को बढ़ाकर $95 प्रति बैरल कर दिया है।
विश्लेषण और प्रमुख कारक
Adसिटी ने अपनी रिपोर्ट में ईरान पर अमेरिकी नाकाबंदी और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से घटे हुए प्रवाह सहित मौजूदा स्थिति को "अस्थिर" बताया है। बैंक को उम्मीद है कि चौथी तिमाही में नए समझौतों या अन्य घटनाक्रमों से यह जलमार्ग फिर से खुल सकता है। सिटी का अनुमान है कि जलडमरूमध्य के फिर से खुलने पर तेल बाजार में प्रतिदिन 3 से 4 मिलियन बैरल का अधिशेष (surplus) हो सकता है, जबकि पहले यह अनुमान लगभग 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन का था।
दूसरी ओर, ANZ का मानना है कि बाजार एक "नाजुक अनुकूलन चरण" में प्रवेश कर रहा है क्योंकि तेल भंडार (inventories) में गिरावट आ रही है। बैंक के अनुसार, भंडार को फिर से बनाने के लिए मांग में और कमी (demand destruction) की आवश्यकता होगी। ANZ का अनुमान है कि संघर्ष के कारण 2026 में फारस की खाड़ी से 2.3 से 2.4 बिलियन बैरल की आपूर्ति कम हो जाएगी।
बाजार के लिए निहितार्थ
इन बढ़े हुए पूर्वानुमानों का मतलब है कि निवेशकों और बाजारों को तेल की कीमतों में निरंतर अस्थिरता के लिए तैयार रहना चाहिए। मध्य पूर्व में कोई भी भू-राजनीतिक विकास कीमतों पर तत्काल प्रभाव डाल सकता है। उच्च तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ा सकती हैं और भारत जैसे तेल-आयातक देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकती हैं।